पथराई आँखों में सपने फिर से आयेंगे
फिर मौसम के फूल झरेंगे पंछी गायेंगे
कभी कभी सपनों को पंख लगाना पड़ता है
नए नए बिरवे को तो सहलाना पड़ता है
अंगद को भी अपना पैर ज़माना पड़ता है
तुम दो कदम बढ़ाओ , हम तो चार बढायेंगे
आँखों में जो सपने हैं उन सबको चुन लेना
बाँध के रखना देखो एक भी सपना भागे ना
हाँ, देखो सपनों को तुम गिरवी मत रख देना
वरना दुष्ट महाजन तुमको फिर छल जायेंगे
आशाओं की रात में सपने जुगनू जैसे हैं
तुम्हे लगेगा हम जैसे थे अब भी वैसे हैं
क्या जानो पाकिट में मेरी कितने पैसे हैं
नेतराम आ जाओ वहीँ समोसा खायेंगे


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