13 April 2012

सपने


पथराई आँखों में सपने फिर से आयेंगे 
फिर मौसम के फूल झरेंगे पंछी गायेंगे 

कभी कभी सपनों को पंख लगाना पड़ता है 
नए नए बिरवे को तो सहलाना पड़ता है
अंगद को भी अपना पैर ज़माना पड़ता है 
तुम दो कदम बढ़ाओ , हम तो चार बढायेंगे

आँखों में जो सपने हैं उन सबको चुन लेना
बाँध के रखना देखो एक भी सपना भागे ना 
हाँ, देखो सपनों को तुम गिरवी मत रख देना 
वरना दुष्ट महाजन तुमको फिर छल जायेंगे 

आशाओं की रात में सपने जुगनू जैसे हैं 
तुम्हे लगेगा हम जैसे थे अब भी वैसे हैं 
क्या जानो पाकिट में मेरी कितने पैसे हैं 
नेतराम आ जाओ वहीँ समोसा खायेंगे 

06 March 2012

होली के पांच दोहे


बच्चे, बूढ़े, नौजवां, गायें मिलकर फाग
एक ताल, सुर एक हो, एकहि सबका राग


सेन्हुर, टिकुली, आलता, कब से हुए अधीर
प्रिय आयें तो फाग में, फिर से उड़े अबीर


महंगाई ने सोख ली, पिचकारी की धार
गुझिया मुंह बिचका रही, फीका है त्यौहार


अबके होली में बने, कुछ ऐसी सरकार 
छोटा जिसका पेट हो, छोटी रहे डकार 


मिली नहीं छुट्टी अगर, मत हो यार उदास 
यारों संग होली मना, यार बड़े हैं खास 

07 January 2012

तरही गज़ल

पिछले दिनों ओ बी ओ पर आयोजित अदम गोंडवी को समर्पित तरही मुशायरे में कही गज़ल हाज़िर है



न काशी से उसे मतलब न मतलब है मदीने से
इबादत क्या करेगा वो जो भूखा है महीने से?



जलाकर एक दिन रख देगी तुमको मान लो भाई
धधकती आग जो उठती है घीसू के पसीने से



जो खादी तुम पहन कर मंच पर करते हो नौटंकी
उसी खादी की उतरन वो पहनता है करीने से



भुलाकर गालियाँ दिन भर की वो ठेके पे आता है
मैं उसको रोक लूं कैसे भला इस शाम पीने से



वो अपनी कार का शीशा चढाता गर न सर्दी में
तो बच्चा कोई दिख जाता लिपटता मां के सीने से



यहाँ मौजों से टकराना ही होगा जान ले वरना
जिसे साहिल की हसरत हो उतर जाए सफीने से



अगर काँटा चुभे ग़ुरबत का, कितना दर्द देता है
समझ में तुझको आएगा अदम को खुद में जीने से

17 December 2011

एक गज़ल

भूख की चौखट पे आकर कुछ निवाले रह गए
फिर से अंधियारे की ज़द में कुछ उजाले रह गए

आपकी ताक़त का अंदाजा इसी से लग गया
इस दफे भी आप ही कुर्सी संभाले रह गए

लाख कोशिश की मगर फिर भी छुपा ना पाए तुम
चंद घेरे आँख के नीचे जो काले रह गए

जब से मंजिल पाई है होता नहीं है दर्द भी
देते हैं आनंद जो पाओं में छाले रह गए

जम गए आंसू, चुका आक्रोश, सिसकी दब गई
इस पुराने घर में बस चुप्पी के जाले रह गये

अब डुबा दे या कि पहुंचा दे मुझे उस पार तू
हम तो सब कुछ भूलकर तेरे हवाले रह गए

उनसे बढ़कर इस जहाँ में है नहीं कोई धनी
अपने पुरखों की विरासत जो संभाले रह गए

23 August 2011

चलो जिंदगी को मुहब्बत बना दें

सभी खार नफ़रत के चुनकर हटा दें
चमन में मुहब्बत के बूटे खिला दें

बुलंदी पे जो हैं वो इतना करें बस
थके हारों को भी ज़रा हौसला दें

मेरे कतरे कतरे पे हैं वो ही काबिज
बता इससे ज्यादा उन्हें और क्या दें

हवाओं का रुख मोड दूंगा यक़ीनन
अगर आप इक लट लबों पर गिरा दें

खुदा की है ये दस्तकारी मुहब्बत
चलो जिंदगी को मुहब्बत बना दें

लगाते हैं जो कीमतें आर पी की
वो बिकता नहीं है उन्हें ये बता दें

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails